Wednesday, July 23, 2025

कामयाबी

रोने से तकदीर बदलती नहीं है
वक्‍त से पहले रात भी ढलती नहीं है
दूसरी की कामयाबी लगती है आसान मगर
'कामयाबी' रास्‍ते में पड़ी मिलती नहीं है

मिल जाती 'कामयाबी' अगर इत्‍तेफाक से
यह भी सच है कि वह पचती नहीं है
'कामयाबी' पाना पानी में आग लगाना है
पानी में आग आसानी से लगती नहीं है

ऐसा भी लगता है जिंदगी में अक्‍सर
दुनिया अपने जज्‍बात समझती नहीं है
हर शिकस्‍त के बाद टूटकर जो संभल गया
फिर कौनसी बिगड़ी बात बनती नहीं है

हाथ बांधकर बैठने से पहले सोच-ए-मुसाफिर
अपने आप कोई जिंदगी, संवरती नहीं हैं।
संजय वाडिया, अनमोल गर्ग संयोग
मंडी आदमपुर, हिसार

2 comments:

हरकीरत ' हीर' said...

रोने से तकदीर बदलती नहीं है
वक्‍त से पहले रात भी ढलती नहीं है
दूसरी की कामयाबी लगती है आसान मगर
'कामयाबी' रास्‍ते में पड़ी मिलती नहीं है


बहुत खूब ....!!

प्रेरणा देती पंक्तियाँ ....!!

Urmi said...

आपकी टिपण्णी के लिए बहुत बहुत शुक्रिया!
बहुत ही ख़ूबसूरत और भावपूर्ण रचना लिखा है आपने जो काबिले तारीफ़ है! इस उम्दा रचना के लिए बधाई!

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