जरा देखों उन कंकालों को
न देश के भूखे लालों को
कुछ पेट से जुड़े सवालों को
क्या यहीं वो भारत माता है
क्या इनसे तेरा नाता है
नित किसकी इज्जत लूटती है
क्यों लाज रोज दम घुटती है
नित मानवता क्यों लुटती है
क्या समझ तुझे कुछ आता है
क्या इनसे तेरा नाता है
क्यों पत्थर दिल इंसान दिखे
ना मंदिरों में भगवान दिखे
हर इंसान में शैतान दिखे
क्यों दिल अक्सर घबराता है
क्या इनसे तेरा नाता है
क्यों फैला भ्रष्टाचार यहां
हर इंसान लगे बीमार यहां
क्यों फूल नहीं बस खार यहां
क्या इनसे तेरा नाता है
प्रोफैसर चंद्र गुप्त, जालंधर
यह कविता समाज की छद्ममता पर आक्रोश है। कवि का आक्रोश उन कथित प्रगतिशीलों की तरफ भी है, जो इंसान की बेहतरी और समानता की बात तो करते हैं, लेकिन जीवन और जीते हैं। कवि किसी नारे में विश्वास करने की बजाय संघर्ष पर बल देता है। कवि को अत्याचार करने वाले इंसान की शक्ल में शैतान नजर आते हैं।।
न देश के भूखे लालों को
कुछ पेट से जुड़े सवालों को
क्या यहीं वो भारत माता है
क्या इनसे तेरा नाता है
नित किसकी इज्जत लूटती है
क्यों लाज रोज दम घुटती है
नित मानवता क्यों लुटती है
क्या समझ तुझे कुछ आता है
क्या इनसे तेरा नाता है
क्यों पत्थर दिल इंसान दिखे
ना मंदिरों में भगवान दिखे
हर इंसान में शैतान दिखे
क्यों दिल अक्सर घबराता है
क्या इनसे तेरा नाता है
क्यों फैला भ्रष्टाचार यहां
हर इंसान लगे बीमार यहां
क्यों फूल नहीं बस खार यहां
क्या इनसे तेरा नाता है
प्रोफैसर चंद्र गुप्त, जालंधर
यह कविता समाज की छद्ममता पर आक्रोश है। कवि का आक्रोश उन कथित प्रगतिशीलों की तरफ भी है, जो इंसान की बेहतरी और समानता की बात तो करते हैं, लेकिन जीवन और जीते हैं। कवि किसी नारे में विश्वास करने की बजाय संघर्ष पर बल देता है। कवि को अत्याचार करने वाले इंसान की शक्ल में शैतान नजर आते हैं।।


1 comments:
बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति ।
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