Wednesday, July 23, 2025

पत्रकार

पुलिस, पब्लिक और पॉलीटिशियन हरदम जिसके दिल में रहते हैं
यह है वो शख्सियत, जिसे पत्रकार हम कहते हैं
पुलिस मारें डंडे इनको, पुलिस डाले केस
फिर भी हारे ना यह जीवन में अपनी रेस
आजकल पत्रकार पर जो करदे टेढ़ी नजर से वार
उसे समझा जाता है लोकतंत्र के चौथे स्‍तंभ पर प्रहार
जो जुड़े है इस फील्‍ड से, सबको उन पर नाज है
लोगों को लिए जो कल है, उनके लिए वह आज है
अपने लिए यह लड़ते नहीं, दूसरों के लिए लड़ते हैं
दिन-घूम इकट्ठी करें, जो खबरें सुबह हम पढ़ते हैं
सच्‍चाई के लिए जो कुछ भी करने को तैयार हैं
सही मायने में उस समय वह सच्‍चे पत्रकार हैं
जो पत्रकारिता को समझे गुरु की बाणी, पत्रकारिता को कुरान भी
पत्रकारिता उसका धर्म भी हो, पत्रकारिता उसका ईमान भी
उनकी पत्रकारिता में जोश हो, लिखने का जुनून भी
उनमें सच लिखने का दम है अगर तो डरता है कानून भी
पत्रकार चांद जैसे नर्म भी है, सूरज जैसी आग हैं
जो बिक जाएं झूठ की खातिर, वो पत्रकारिता पर दाग हैं
ऐसे लोगों को दूर करें, आप अपने आप से आज से,
इनके कारण ही गिरती है पत्रकार की साख समाज से
मैं भी बनना चाहता हूं, एक अच्‍छा पत्रकार
कुछ सीखा है, कुछ सीखने को हूं तैयार
जो सीखूगां यहां से, दूसरों से काम लाऊं
तभी सही मायने में मैं पत्रकार कहलाऊं
विजय जैन, 9643004550, 8054002331

अहसास का विकास

आज जब देखता हूँ, चारों ओर, हर तरफ़ एक नया अहसास ही महसूस करता हूँ। सिर्फ़ एक बात ध्यान आती है जो कुछ भी हो सिर्फ़ मेरे लिए नया अनुभव ही तो है। वाकई कई बार ऐसे अवसर मिलते हैं जिनमे अपने आपको सहेजकर जीवन जीने में आसानी हॊती है।
ऐसा भी होता है जब चुनौतियां स्वीकार करते-करते मानसिकता में कुछ बदलाव आये,लेकिन यह स्वीकार्य है कि नये अनुभव के साथ ही कई चरण समूहों से गुजरने के बाद कुछ करने का दृढ़ विश्वास बनता है। अब सोचता हूं कि नया अहसास कब और कैसेे महसूस किया जाता है। वास्तव में अहसास का विकास चेतना तभी बनता है, जब साहस में दुस्साहस करने की वृति पारंगत बन जाए।

न करो नादानी

न करो तुम अपनी मनमानी
मान भी जाओ, न करो नादानी
आउंगी इस दुनिया में तो मैं तुम्‍हें दिखाऊंगी
नाम करुंगी रोशन तुम्‍हारा, आदर्श स्‍त्री कहलाऊंगी
जब तक रहेगा साथ तुम्‍हारा, तबतक यह अहसास रहेगा
जीना सिखाया मुझ बाला को, पूर्ण आत्‍मविश्‍वास बढे़गा
आप देंगे संस्‍कार मुझे, अबला बच्‍ची जानकर
मैं उन्‍हें सफल बनाऊंगी, आदर्श सिद्धांत मानकर
आपकी मेरे प्रति समर्पित भावना पर
हर पल फूल चढ़ाऊंगी मैं,
करेंगे जो नेक उपकार मुझपर
न भूल उसे पाऊंगी मैं
आपके मेरे ऊपर किए उपकारों का,
कैसे बदला चुकाऊंगी मैं,
बस आपकी आन-शान की लाज रखकर
अपना भविष्‍य उज्‍जवल बनाऊंगी मैं
अगर आप देंगे अपनापन-सा
अधिकार जीवन जीने का,
तभी यह रिश्‍ता जुड़ पाएगा 
बंधन, एकता और प्‍यार का
संदीप कुमार, 9416964679


नशे की बर्बादी

मत समझों नशों को तुम,
अपनी जान से बढ़कर,
क्‍योंकि विघटित करे समाज अपना 
मानवता के सिर चढ़कर
नशे को अपनाकर,
जिसने की अपनी मनमानी,
गंवा बैठा वो स्‍वास्‍थ्‍य अपना,
लुटा दी पूरी जवानी
जिन नशों के लिए तुम धन अपना,
पानी की तरह बहाते हो,
क्‍या जानते नहीं सीवरेज की गंदगी हैं,
जो इनको मुंह लगाते हो
नहीं छोड़ा नशे को अब,
तो कैसे बचेगी तुम्हारी जान
किशोरावस्‍था ही बन
जाएगी/कहलवाएगी
बुढ़ापा तुम्हारी पहचान
बीमारियां भी लगेंगी कई हजार तुमको,
न तुम्‍हारी कोई जमानत होगी
अमूल्‍य जन्‍म भी गंवा बैठोगे अपना,
भविष्‍य पीढ़ी की भी
तुम्‍हें लाहनत होगी
लाहनत होगी, लाहनत होगी।।
संदीप कुमार, 9416964679


कड़वी सच्‍चाई

कलयुग में हमारे सामने, आई जो कड़वी सच्चाई
बेटे की चाहत में जिन्‍‍‍होंने, बेटी को पलभर किया पराई
बेटी को हीन समझकर, इंसानियत भूल चुके वो लोग
बेटे का स्‍वार्थी प्रेम देख, हैवानियत के झूले झूल चुके वो लोग
बेटी क्‍‍‍या बनेगी बड़ी होकर, यह भी ना समझा भाई
क्‍‍या भ्रूण-हत्या महापाप कर, तुम्‍हें शर्म नहीं आई
शर्म क्या आतीं अब तो, दिल भी पत्थर बना लिया तुमने
यह पाप महागुनाह कर, बच्ची का भविष्य जो उजाड़ दिया तुमने
अब न देख पाएगी आने वाला पल, जिसे उसे अपना कल बनाना था
मिलकर अंजाम दिया जिन्होंने, सच! कार्य किया बड़ा घिनौना था
अब न देख पाएगी वो ममता का आंचल
जिसने उसे अनाथ किया
जरा रहम भी आया, उस मासूम अबला पर,
मर्जी को अपने कृतार्थ किया
यदि होता रहा बेटियों पर, यह निरंतर अत्याचार तो 
कैसे उज्जवल होगा, देश का भविष्‍य,
जरा सोचो भाईयों!
कुछ तो करो विचार
नहीं रोक पाएंगे उस बर्बादी को तब

क्‍योंकि लड़कियों की कमी हो रही समाज में, लड़के हैं आबादी पर अब
इसलिए हमें समाज में लड़कियों को, जीने का अधिकार दिलाना होगा
ताकि उज्जवल कर सकें, यह देश का भविष्य
साकार इसको बनाना होगा
संदीप कुमार, 9416964679

बेटी का विश्‍वास

माता-पिता का दुलार
जो बनता है बेटी के प्‍यार से
यही प्‍यार जोड़ता है मुझे
समाज, रिश्‍ते और परिवार से
आपकी समर्पित भावना
आपके आदर्श संस्‍कार 'गर
मिलेंगे मुझे यूहीं हरदम
तभी पूर्ण विश्‍वास के साथ
आगे चलूंगी मंजिल की ओर
मानव से कदम बढाकर कदम
जीवन जीने का अधिकार देंगे
गर अबला बच्‍ची जान
तभी नाम करुंगी रोशन तुम्‍हारा
रखूंगी लाज आपकी आन-शान की
बनूंगी एक आदर्श स्‍त्री
जो बन जाएगी/कहलवाएगी
भविष्‍य में आपकी व
समाज की आदर्श पहचान
संदीप कुमार, 9416964679


दो-चार दिन

प्‍यार के दो चार दिन, व्‍यवहार के दो चार दिन
इनकार के दो चार दिन, इकरार के दो चार दिन
जमाना है दो चार दिन, पैमाना है दो चार दिन
मुस्‍कराना है दो चार दिन, अफसाना है दो चार दिन
मुहब्‍बत के इकरार टूट जाते हैं
बड़े-बड़े व्‍यवहार टूट जाते हैं
कसमें और प्‍यार टूट जाते हैं
वफा के इजहार टूट जाते हैं
मंजिल पे पहुंचे राही के
हौंसले और आधार टूट जाते हैं
टूटने की रहे ना कोई वजह
तो होती है, बजने की
इंतहा पे कभी तार टूट जाते हैं
हर दिन एक इशारा है, इंसान की जिंदगी का किनारा है
जो करना है आज ही कर लो,
मौत ने अपना फन पसारा है
हो सकता है कल पछताना पड़े,
नहीं कर सके जो उसके लिए घबराना पड़े
सुरजीत दुखी, गली जट्टां वाली, अमृतसर

क्‍या इनसे तेरा नाता है

जरा देखों उन कंकालों को
न देश के भूखे लालों को
कुछ पेट से जुड़े सवालों को
क्‍या यहीं वो भारत माता है
क्‍या इनसे तेरा नाता है
नित किसकी इज्‍जत लूटती है
क्‍यों लाज रोज दम घुटती है
नित मानवता क्‍यों लुटती है
क्‍या समझ तुझे कुछ आता है
क्‍या इनसे तेरा नाता है
क्‍यों पत्‍थर दिल इंसान दिखे
ना मंदिरों में भगवान दिखे
हर इंसान में शैतान दिखे
क्‍यों दिल अक्‍सर घबराता है
क्‍या इनसे तेरा नाता है
क्‍यों फैला भ्रष्‍टाचार यहां
हर इंसान लगे बीमार यहां
क्‍यों फूल नहीं बस खार यहां
क्‍या इनसे तेरा नाता है
प्रोफैसर चंद्र गुप्‍त, जालंधर

यह कविता समाज की छद्ममता पर आक्रोश है। कवि का आक्रोश उन कथित प्रगतिशीलों की तरफ भी है, जो इंसान की बेहतरी और समानता की बात तो करते हैं, लेकिन जीवन और जीते हैं। कवि किसी नारे में विश्‍वास करने की बजाय संघर्ष पर बल देता है। कवि को अत्‍याचार करने वाले इंसान की शक्‍ल में शैतान नजर आते हैं।।

संवाददाता

उत्‍साही, परिश्रमी, मेहनती, हरफनमौला, जिज्ञासु, व्‍यावहारिक, कुशलदक्षी, महत्‍वाकांक्षी, स्थिति अनुसार ढ़लने की प्रवृति, निर्विवाद आदि ये संवाददाता के वे असाधारण गुण हैं, जिनके बलबूते वे समय सापेक्षता के बल पर अनिश्चितकालीन मार्ग विचारधारा पर चलते हुए पत्रकारिता के तमाम प्रयासों पर संज्ञान लेते हुए समाज का दिग्‍दर्शन करते हैं
संदीप कुमार, 9416964679

संघर्ष

पढ़कर, सुनकर, देखकर निकला यह निष्‍कर्ष।
योद्धा बन लड़ते रहो, जीवन एक संघर्ष।।

जग में सबके पास है, अपना-अपना स्‍वार्थ।
केवल अपना कर्म है मानव तेरे हाथ।।

कर्मक्षेत्र में जो डटे लिया लक्ष्‍य को साध।
वहीं चखेंगे एक दिन, मधुर जीत का स्‍वाद।।

रखती है प्रकृति सदा, परिवर्तन से मेल।
शूरवीर बस ढूंढते, नित्‍य नया एक खेल।।

जागो आगे बढ़ चलो, करो शक्ति का ध्‍यान।
केवल ढृढ़ संकल्‍प से, संभव नव-निर्माण।।

मौन हुआ वातावरण, मांग रहा हुंकार।
वक्‍त पुकारे आज फिर हो जाओ तैयार।।

कुछ तो ऐसा कर चलो, जिस पर हो अभिमान।
इस दुनिया की भीड़ में 'अदभुत' हो पहचान।।
अरुण-मित्‍तल 'अदभुत', काठ मंडी, चरखी दादरी

कामयाबी

रोने से तकदीर बदलती नहीं है
वक्‍त से पहले रात भी ढलती नहीं है
दूसरी की कामयाबी लगती है आसान मगर
'कामयाबी' रास्‍ते में पड़ी मिलती नहीं है

मिल जाती 'कामयाबी' अगर इत्‍तेफाक से
यह भी सच है कि वह पचती नहीं है
'कामयाबी' पाना पानी में आग लगाना है
पानी में आग आसानी से लगती नहीं है

ऐसा भी लगता है जिंदगी में अक्‍सर
दुनिया अपने जज्‍बात समझती नहीं है
हर शिकस्‍त के बाद टूटकर जो संभल गया
फिर कौनसी बिगड़ी बात बनती नहीं है

हाथ बांधकर बैठने से पहले सोच-ए-मुसाफिर
अपने आप कोई जिंदगी, संवरती नहीं हैं।
संजय वाडिया, अनमोल गर्ग संयोग
मंडी आदमपुर, हिसार

जीवन की सार्थकता

बदला लेकर बदलने वाले बदला नही जो तू
बदल जायेगा भविष्य तेरा दिल से सबके उतर जायेगा तू
कर होश संभल ऐसा न खुद अकेला जानकर
बढ़ चल आगे, राह है मुश्किल, बहता दरिया मानकर
जिल्लत भी मिली अगर, फखत ऐसा ना समझ
नुराए आसमान पर तैरती मिलेगी किस्मत तेरी
कर होश! संभल जा! विचार कर

एक जिद इतिहास तराशकर भविष्य में मिसाल बनने की
संकुचित आवश्यकताओं का दायरे बढ़ाने की
आओ आगे बढ़ चले, इसे पाकर ही हम संतुष्ट होंगे
लेकिन मतलब नही जीवन के लक्ष्य को दरकिनार करे
परिवर्तनशील समय के दायरे कायदा भी बनेगा प्राकृतिक
बुद्धि पर रहेगा किसी और का नियंत्रण, तब श्रेष्ठ अवस्था बनेगी सार्थकता
संदीप कु़मार, 9416964679

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